तुमने
क्या सोचा था?
कि
सिल्क पर जरदोज़ी का काम की हुई
साड़ी
का तोहफा देकर खुश कर दोगे मुझे?
हो
जाती मैं...
पर
तुमने साड़ी के साथ ही मुझे लाज का एक कपड़ा जो पहना दिया -
ढ़क
के रखो
ऊपर
से थोड़ा सा और नीचे से वो टांग भी
घर
के भेद, तुम्हारी अम्मा के ताने,
तुम्हारी बुरी आदते,
यारों
के भद्दे मज़ाक, हमारी तू तू मैं मैं,
मेरी शिकायते,
सब
ढ़क लूँ मैं, छः फीट साड़ी के पीछे?
तुमने
क्या सोचा था?
कि
मीना जड़ी सोने कि खनकती चूड़ियाँ और मोती जड़े चांदी के छ्नकते झांझर
ब्याह
में पहनाकर कर खुश कर दोगे मुझे?
हो
जाती मैं
पर
तुमने चूड़ियों और झांझर के साथ ही मुझे ताउम्र बेड़ियों में जकड़ लिया -
वहाँ
मत जाना, उधर मत घूमना,
इतनी देर घर से बाहर कैसे रह गयी तुम?
किस्से पूछ कर गयी थी
और
वो कमीना जिसे दोस्त बोलती हो, सोचा भी
कैसे कि वो तुम्हें घर छोड़ेगा?
मायके
में भी कोई इतने दिन रहता है भला?
उड़ना
चाहती हो तो उड़ो पर याद रखना
एक
बार जो तुम्हारे पाँव डगमगाए तो मेरी ये चूड़ियों ही संभालेगी,
संभल के चलो।
उफ!
बांध लूँ मैं खुद को तुम्हारी दहलीज़ कि चूड़ी से?
तुमने
क्या सोचा था?
कि
Loreal
के मेकअप, Lakme कि lipstick
और
Chanel
के perfume
कि खुशनुमा किट से खुश कर दोगे मुझे?
हो
जाती मैं
पर
तुमने मेकअप का एक ऐसा mask पहना दिया जो मेरा था ही नहीं -
नयी
बहू के सिर पर पल्लू अच्छा दिखता है,
बड़ो
के पैर छुआ करो फिट चाहे भले ही वो कपटता कि चलती फिरती दुकान क्यों न हों
ठीक
है पड़ोस का लाला रोज़ पी कर गुंडागर्दी करता है,
तुमसे
तो नहीं की न? फिर चुप बैठो!
अरे,
कभी कभार गुस्सा आ जाता है तुम पर,
तो
ऐसा क्या हो गया?
आँखों
कि सूजन पर काजल के एक मोटी लकीर,
गाल
पर पड़े उँगलियों के निशान पे गुलाबी blush
सिर
की खरोच के किनारे पर लाल बिंदी,
और
अंदर के घाव पे वक़्त का moisturizer लगाना ही
तो है,
और
हाँ,
अपने होठो पर न सही, ज़ुबान पर lipstick
लगाना मत भूलना
ताकि
नाप तौल कर public में मुंह खोल सको
पर
यार कुछ भी कहो, बहुत सुंदर दिखती हो तुम।
तुम्हें
लगा,
मुझे Mrs
India
सा महसूस होता है तुम्हारे दिये मेकअप के पीछे?
चार
साल की थी जब सफ़ेद घोड़े पर सवार, वीर
राजकुमार की कहानी सुनी थी
ना
ना! वुश्वास थोड़े ही ना किया था!
मैं
किसी कहानी के किताब के दबे अक्षरो में पिरोया पात्र थोड़े ही हूँ?
जीवित
हूँ,
सोचती
हूँ,
महसूस
करती हूँ,
ज़िरह
करती हूँ,
प्यार
करती हूँ...
पर
लगता है तुमने भी वो ही कहानी पढ़ी थी?
और
हास परिहास में खुद को सफ़ेद घोड़े पर सवार वीर राजकुमार समझ बैठे
और
मुझे?
साड़ी,
चूड़ियो, झांझर,
रंग और इत्र में लिपटी एक राजकुमारी
जो
ठीक किताब की तरह चुप छाप पन्नो के बीच दबी रहती है
जो
चाहे,
जब चाहे खोल के पढे और ना पसंद आए तो, धपाक! Chapter
close!
पर
मैं तो बोलूँगी,
तब
तक बोलूँगी जब तक तुम्हें ये ना दिखे
की
मेरी साड़ी एक छह फीट का लबादा नहीं,
वो
नरमाहट भरी छाह हैं जिसमे हर रात तुम अपना धिक्कार छिपाते हो,
वो
ममता है जो तुम्हारे सात पुश्तो के घाव पर रेशम का मरहम लगती है,
द्रौपदी
का वो तूफान है जो जब बंटता है, तो
महाभारत के युद्ध का यालगार होता है,
जब
फटता है, तो हर करुणावती का एक भाई तैयार होता है,
और
जब कमर पे बांधता है, तो झाँसी के किले की 22 फीट की
दीवार लांघ एक कोमलाङी का बिगुल बजता है
ये
साड़ी नहीं क्षैतिज का वो चादर है
जो
अगर फट पड़ा, तो सैलाब बरसागा!!
देखो,
मैं तो बोलूँगी,
तब
तक बोलूँगी जब तक तुम्हें ये ना दिखे
कि
मेरी चूड़ी काँच की कमजोर कड़ियाँ नहीं,
वो
खनक है जिसने तुम्हारे आँगन के हर कोने की मनहूसियन में रोजाना अपना मधुर संगीत
छेड़ती है,
वो
गोल चक्रवात है जिसकी दुनिया तुम्हारे प्रेम के इर्द गिर्द घूमती है,
पर
जब टूटती है तो जीवन से जुड़ी तुम्हारी एक डोर भी टूट सी जातो है।
कि
मेरी lipstick
होठों पर जमा लाल रंग का वो पैबंद नहीं,
वो
सुर्ख चुंबन हैं, जो तुम्हारी काली कड़वी ज़ुबान पर बैठ
उसे रंगीन कर देती है,
वो
हस्ताक्षर हैं जो रात दर रात तुम्हारे शर्ट पर जीवन संगिनी होने की मीठी पहचान जड़ जाती
है
पर
जब बिखर पड़ता है तो खौलते खून के उबाल से नासूर छाले छोड़ जाता है।
कि
तराशे काँच में रखा महंगा perfume, बोतल में
बंद हमारे सपने नहीं
वो
खुशनुमा हवा का झोंका है जो तुम्हारी रूह में मेरा प्यार और अस्तित्व,
दोनों को घोलते है
और
हमारे छोटे से घरोंदे को यादों की गमक से सराबोर कर देते हैं
पर
जब बोतल से उड़ निकलते हैं, तो तुम्हारी दुनिया से सब कीमती
लम्हे अपने साथ हमेशा के लिए ले जाते हैं।
दरअसल,
मुझे
खुश करना बहुत आसान है।
ज़्यादा
भारी नहीं पड़ेगा तुम्हारी पॉकेट को,
बस
कुछ छोटा मोटा समान जो इज्ज़त की दुकान में बेमोल मिलेगा,
साड़ी
की जगह, उड़ने के लिए थोड़ा सा आसमान
चूड़ियों
की जगह, तुम्हारे हाथ का सहारा
झाँझर
की जगह, नन्हें सपनों के पहिये
Lipstick
की जगह, मुझे ‘ना”
बोलने का हक़
और
इत्र की जगह, तुम्हारे भरोसे की गमक
क्यों,
तो क्या सोचा तुमने, मुझे कैसे सजाओगे?
I hv never read such beautiful piece of writing
ReplyDeleteGreat work again.
Good morning
This is a huge compliment. Powers my fearless pen all the more. Thank a ton!
Deleteबहुत सुंदर एवं भावपूर्ण कविता.
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया!
DeleteLoved it...Really it does touches the core...❤
ReplyDeletevery nice mam....
ReplyDeleteइस कविता को Women's Day पर जब Spill Poetry मे देखा तो तुमने हम सबको मंत्र मुग्ध कर दिया. सचमुच बहुत मस्त और निराले अंदाज़ मे तुमने अपना Performance दिया. KENA, YOU ARE SIMPLY.................
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